Monday, August 20, 2007

विडंबना

आसान होता है
देना किसी और को दोष;
जब हावी होता है
अपनी सफलताओं का जोश.

उपलब्धियों का नशा,
कुछ ऐसा छा जाता है,
आजू बाजू चलता हर प्राणी,
बहुत तुच्छ नज़र आता है.

परिस्थितियाँ अक्सर
बिना आहट दिए बदल जाती हैं.
अर्जुन के तीर भी होते हैं शिथिल,
सीता सी सती भी वन को जाती है.

कैसी असहाय परिस्थिति...
विवश कर देती कठोर नियती.
आश्चर्य! किंतु फिर भी;
मनुष्य को मनुष्य कि अवस्था पर हँसी आती है !

1 comments:

dehati said...

bahut badhiya