बंद आँखो से तुम साफ दिखते थे.
इशारों से हर बात समझते थे.
तुम्हारी आहट पर असयन्मीत हो जाती थी.
पीठ के पीछे से तुम्हारी नज़र मन तक भेद जाती थी.
निरंतर, निरर्थक बोलती ज़ुबान पर ताले लग जाते थे.
तुम्हारे आते ही सारे उल्कापात शांत हो जाते थे.
एक आवाज़ पर तुम्हारी नंगे पैर भागी चली आती थी.
बिना होंठ हिले ही हर बात समझ आ जाती थी.
तुम एक पर्वत से लगते थे,
मैं छाव मैं बैठ जाती थी.
ना जाने क्या था उन बाहों में...
निस्वप्न, निर्विघन, अटूट नींद आती थी.
जब पर्वत की चट्टाने मोम की हो जाती थीं,
मेरे शरीर के आस्तित्व को पहचान सी मिल जाती थी.
तुम छूते थे या जादू था... दर्पण ही जाने,
ऐसी गुलाबी छवि दिखे अपनी, कि आँखे ही ना माने.
मन में कहीं छुपी थी,
ऐसी ही तुम्हारी छवि थी.
सारी दुनिया से अनूठे तुम... गहरे, गंभीर, संभ्रांत.
जिसके सम्मुख ये चंचला हो जाए शांत.
ये तो मन था...
मन का ताना बाना था।
मन अब उड़ने को तैयार खड़ा था,
डोली को तुम्हारे आँगन का रास्ता पता था।
स्वप्न सब साकार होना चाहते हैं,
तुम्हे अनुभव करना चाहते हैं,
ये तुम्हारा आँगन है,
अब ये जीवन का प्रांगण है.
कल्पनाओं और वास्तविकता के बीच दूरी है.
मूल बात ये है कि जिंदगी अधूरी है.
रूप, रंग, मन, बुद्धि... सब बेमानी लगता है.
मन प्यार कर बैठा उसे जो प्यार का अर्थ नहीं समझता है.
कान कुछ सुनने को तरसते हैं,
बिस्तर पर सिलवटें भी नही आती हैं;
शृंगार किया, शृंगार उतार दिया...
किसी की निगाहें चेहरे तक भी नहीं आती हैं.
तुम हो घर में, खोए खोए अपने आप में;
बार बार कानो को तुम्हारी पुकार सुनाई दे जाती है;
कदमों कि आहट होती है, दरवाज़ा बंद होता है
फिर हर आस सो जाती है।
रंभा बन कर रिझाऊं किसको?
किससे रूठू और मनाऊ किसको?
एक छत के नीचे रह रहे दो अजनबी;
शनि, केतु, राहु... भला दोष दूं किसको?
इस जीवन में ही वो स्वप्न जीना था,
ये जीवन बीता जा रहा है;
मन बहुत तड़पता है,
दर्द हर दिन बढ़ता जा रहा है।
मन अशांत होगा, जब चिर निद्रा आएगी;
अतृप्त आत्मा शायद कभी शांति नही पाएगी।
मेरा श्राद्द तब तुम पूरा करोगे...
जब कभी ये समझ सकोगे...
अनछुआ मन, अन्छुई आत्मा, एक निरर्थक आस्तित्व;
कितना बोझ सा लगता था...
तुम्हारे आँगन में बिना जमे ही सूख गयी ये जड़,
अंदर बाहर सब रेगिस्तान सा लगता था।
अंदर बाहर सब रेगिस्तान सा लगता था!!!
3 comments:
Mamta jee aapki kavita ekdum dil ke andar tak utar gaayi. Shayad kuchh log prem ko samajh hi nah pate...aur jab samajhte hain tab tak kuch baaki nahi reh jaata....waqt nikal jata hai..aur sirf bach jaati hain to sirf yaadein.
yaar, u dnt know aapne kya kah diya.yhi such hai.such me,pyar ki paribhasha jo hum sochte hain wo to kahi kho hi jati hai, jeevan ki sachchai me.
This poem has left me speechless. Comments dene ki liye bhi poet hona padega nahin to standard maintain nahin hoga. Itni achichi poem ka comment bhi achcha hona chahiye but I am seriously left with no words to express how this poem has touched the heart.
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