Wednesday, November 26, 2008

Back to basics

माँ का चौंका, गद्दी बाबू जी की;
बाबा का था ठाकुर-द्वारा, हर चाभी थी दादी की!

साधन ज़रूर कुछ कम-कम थे जहाँ,
हौसले मगर आसमान छूते थे वहाँ.

खुली छत पर बिखरी सर्दियों की धूप थी,
गर्मियों में पैर तले बाग़ीचे की ठंडी दूब थी.

आँगन में लेट कर तारे देखने के लिए वक़्त था,
हर नया गाना याद कर लेने में ये मन अभ्यस्त था.

ढ़ेर किताबों के बीच और इम्तिहानो के दरम्यान;
भली सी थी ज़िंदगी, बैचैन से सपने, बहुत सा इत्मिनान.

वो बाबूजी की हसरतें और माँ की दुआएँ;
अपने सपनो की बैचानियाँ देखो कितना दूर ले आए.

इस भागम-भाग में जाने कहाँ पीछे छूट गया है वो घर,
कुछ रीता सा, कुछ खाली-खाली सा लगता है भीतर.

छत छूटी, आँगन छूटा और छूट गया बागीचा,
सड़क पर रेंगती गाड़ी से अब चाँद भी नही है दिखता.

बहुत बड़ा हो गया बाबा तुम्हारा ये बच्चा,
जग सारा देख लिया दादी; अपना आँगन सबसे अच्छा.

संभाल लो माँ; चौंका छोड़ अब चाभी तुम संभाल लो,
बाबूजी काम करूँगा मैं, बस कमान तुम संभाल लो.

घर आकर हर शाम तुमसे बात करना चाहता हूँ,
तुम्हारी छाया में सारी थकान धोना चाहता हूँ.

कहता है मन; आते ही तुम्हारे सब फिर वैसा ही हो जाएगा,
इस दो कमरो के घर में ही मेरा आँगन, छत, बगीचा बस जाएगा.

मन जो ढूंढता फिर रहा है वो दीवारों का मकान तो नही है ना...
जो खाली खाली सा लगता है भीतर वो तुम हो, तुम्हारा साथ है माँ.

एक मुश्किल सी कोशिश है वापस वो खोया सुकून पा लेने की;
कौन जाने इंतज़ार कर रहीं हो खुशियाँ दोनो जहानो की!

1 comments:

Rashmi said...

Such an emotional and touching poem. My eyes are moist after reading this and have sent me down the memory lane.