सपने नही होते हमारी जीती - जागती दुनिया में।
सपनो से बहुत दूर होती है हक़ीकत बस; रोज़मर्रा में।
ये सब जानकर भी मन टूटता है कभी - कभी,
ना ना.. इसलिए नही कि हक़ीकत है बुरी।
बुने हुए ख्वाबो को सच करा लेना इतना आसान नही है,
बखूबी समझता है; ये मन इतना भी नादान नही है।
पर कभी - कभी कुछ ऐसा होता है हमारी आँखो के सामने;
जो मन ने कभी सोचा ही नही; अब दिमाग़ भला कैसे माने ?
वो होता है बेशक़ीमती किसी ख्वाब से ज़्यादा, कहीं ज़्यादा।
बस उसके साथ ही जीने लगता है निश्चल मन ये सीधा - सादा।
फिर अचानक ख़त्म हो जाता है वो, जैसे वो शुरू हुआ था।
फिर वो हमसे रुकता नही; हां, वो हमने खुद किया भी तो नही था।
एक रोज़ अचानक से कुछ मिला, जो सोचा नही था।
फिर बस छूट गया हाथ से जब रोक लेने को जी था।
बहुत कुछ टूटता है, बिखरता है, दर्द अपनी हद से भी गुज़रता है;
पर चाहो ना चाहो, ज़िंदगी में कभी - कभी यूँ भी होता है।
1 comments:
sach hai ....
jindgi me kabhi kabhi yu bhi hota...
hum rok nhi pate bus jo hota hai....
this poem is unfolding exactly my state of mind this time..
Garima
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