तुम्हे एहसास है हक़ीकत का; हमे भी एहसास है हक़ीकत का
फिर होंठ हिलते हैं और आवाज़ हवा में तैर जाती है
अल्फाज़ो के उस हुज़ूम में, हक़ीकत ना जाने कहाँ गुम हो जाती है ?
तब महसूस होता है वो अंतर, जो होता है एहसास में और बयान में !
तब छटपटाते हो तुम; छटपटाते हैं हम
हां ! मन से होठों तक की ये दूरी कभी इतनी लंबी हो जाती है;
कि उस दरम्यान, पूरे अधूरे बयान,
पूरी अधूरी कहानियाँ बदल जाती हैं !
पूछो ये तड़प उस माँ से जो अदालत जाती है,
हक़ीकत जानती है वो, हक़ीकत जानते हैं सब
बस बदकिस्मत कोई बयान नही जुटा पाती है
पथराई आँखे देखती रहती हैं सामने से गुजरता बेटे का कातिल;
हर पल मरती रहती है ये ज़िंदा लाश... तिल-तिल !
पूछो ये तड़प उस बड़ी होती बच्ची से,
जो लुटी हो किसी अज़ीज़ बुज़ुर्ग के हाथों
आदाब अर्ज़ करती है, इज़्ज़त से बैठाती है,
डाल के पल्लू सिर पे चाय भी पिलाती है
शर्म की मारी, शर्म बचाती, होंठ सी के रह जाती है !
पूछो ये तड़प उस दिल से,
जो बस पढ़ता रहा किसी कि निगाहें,
और मान बैठा; कि इकरार, भला ज़ुबान कहाँ चाहे ?
उसके लिए वो लम्हा थम सा गया था,
"ग़लतफ़हमी है तुम्हे..." जब किसी ने पलट कर कहा था !
ऐसे ही रोज़मर्रा के फसानो में, क़िस्सो में, बयानो में,
कभी झाँक कर देखो; तस्वीर बदली हुई नज़र आती है
एहसास और बयान के बीच की लंबी दूरी,
कभी कभी बहुत साफ नज़र आती है !
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