Sunday, August 31, 2008

हमारी त्रासदी - सिंगुर, मराठी मानुस और अनचाहे मेहमान

छत्रपति शिवाजी रेलवे स्थानक पर रुकती रेल गाड़ियों से,
रोज़ मुंबई में उतरते हैं कुछ ग़रीब हिन्दुस्तानी.
घर छूटा, बोली छूटी, ज़मीन बेच कर खरीदे टिकट से,
महानगरी में रोटी ढूँढते कुछ ग़रीब हिन्दुस्तानी।

हिंदुस्तान में हिन्दुस्तानी होना कभी कभी बहुत भारी पड़ता है,
अपने ही वतन में एक मराठी मानुस के हाथों एक भैया जलील होता है.
ये सब देख कर हिंदुस्तान कि हालत पर हंसता है,
लोकल-ट्रेन में लगा कर बम एक बांग्लादेशी; सीना तान के निकल लेता है.

हर राज्य के हर शहर और हर गाँव कि गलियों में,
मिलते हैं कुछ लोग गैर - हिन्दुस्तानी.
विदेश नीति, राज नीति, कूट नीति और जुगाड़ो के बीच में,
बे रोक टोक बढ़ते हैं और पनपते हैं कुछ गैर - हिन्दुस्तानी।


सरहद पार से आए वोट बैंक दिल के ज्यादा करीब हैं,
आज के रिश्ते नाते दरअसल बहुत अज़ीब हैं,
अपना और पराया नये सिरे से चुना जाता है;
ख़ूँख़ार से पिट लेते हैं, ग़रीब को पीट लिया जाता है.

जायदाद बाँट रहे हैं हम, थोड़ा दिमाग़ खरचने में हर्ज़ नही है;
घर के लड़के को बाहर करना, गैर को अंदर घुसाना कोई हल नही है।
शक्ति है तो सही जगह लगाओ, तोड़ दो बम बनाते हाथो को,
आराम दो, लंगर खिलाओ मानसिक विक्रत राजनेता, धर्मनेताओं को।


एक राज्य का नेता रोज़गार नही बढ़ाता है,
भूखा आदमी गाँव छोड़ दिल्ली मुंबई भागता है,
दूसरे राज्य का नेता मुद्दा बनाकर अपनी ख़त्म होती राजनीति बचाता है,
जो बनने में लगता है ज़माना; वो पल में भस्म हो जाता है.

कुछ तो है जो ठीक नही है; कुछ तो है जो बदलना है.
सिंगूर रोता है; रोज़गार का सपना फिर से दफ़न होता है.
जब किसान खुदकुशी करे तो सारा क़र्ज़ हो जाता है माफ़,
लेकिन जिन्दा किसान कि खड़ी फसल के लिए बाज़ार तक जाने का कोई रास्ता नही होता साफ़.

यकीं मानो या तो भगवान् सो गए हैं या ऊपर के बही खाते गड़बड़ हो गए हैं;
आम आदमी को ग़लत करनी का फल बहुत जल्दी मिल जाता है,
तबाह कर देते हैं करोड़ों को एक बार में एक भाषण से लेकिन क्या हुनर है...
कि नेताओं पर कभी बुरे वक्त का साया भी नही आता है.

भाई मेरे, आंखे खोलो और पहचान लो;
जिहाद को एक अच्छा मुकाम दो.
मार कर उसके बन्दे को उससे दूरी मत बढाओ
जब चढानी हो बलि तो किसी दैत्य कि चढाओ।