रात कोई घर में घुसा था, मैं अकेला निहत्था खडा था;
भाई तुम साथ आकर खड़े हो गए, बस ये हौसला बड़ा था।
जो तुम ना आते आज, तो कल ये दिन - दहाड़े भी घुस आते,
मेरे तुम्हारे बीवी - बच्चे अकारण ही बलि चढ़ जाते।
आज एक बात और कह लेने दो मेरे भाई, जो तुम ना आते...
तो जहन में बड़े अजब - अजब से ख्याल भी आते
कौन जाने तुमने ही भेजे हो वो दंगाई -मवाली,
बस यूँ ही कुछ भी सोचता हैरान -परेशान दिमाग ये खाली।
ये भाषा, ये रहन - सहन अजनबी, ये सूरत यहाँ की नही,
तब बता देते थे बाबा मेरे, सिर्फ चेहरा महज देख कर।
ना पहचान सके सरहद पार से आकर बस गए घुसपैठिये वही,
तमाम नेता और अधिकारी आजतक ढेरों सुबूत देख कर
पुराने मुसलमान भी बचे हैं कुछ, जिन्हें बचपन से जाना था;
सुना है आज बकरीद हुई काली पट्टी पहन कर।
शायद खोया सुकून वापस मिल जाए आगे राहों में;
आज उम्मीद बंधी है ये, घर में जाने पहचाने लोग देख कर।