Saturday, April 25, 2009

मन-स्थिति


पता नही खुद को जिंदगी से कल क्या चाहिए ?
हर रोज़ अपनी ख्वाहिशें औरों को देख के तय करते हैं।
आज तो मुकम्मल लगता नही है कभी भी,
पर जाने क्यूँ बीतने पर उसको बहुत याद करते हैं।


हर दिन काम करते-करते छुट्टी का इंतज़ार करते हैं,
और छुट्टी के रोज़ हम और भी ज़्यादा काम करते हैं।
बच्चे अब बस जल्दी बड़े हो जाएँ... यही कहते रहे हम,
अब बाहर निकल गये उन बच्चों का बचपन याद करते हैं।

सुबह की भागम-भाग में कितना मुश्किल था ,
एक धूप मात्र जलाना दीवार पे टँगे हनुमान जी के आगे।
शनि भारी है तुम्हारा... पंडित जी ने क्या बताया,
अब शनिवार को मंदिर की लाइन में लगते हैं हम भागे-भागे।

बहुत उब चुके थे उस छोटे से निष्प्राण शहर से ,
पहला मौका मिलते ही हमने उसको प्रणाम कर लिया।
अब मिलते हैं खोज-खोज के उसी शहर के लोगों से ,
आज वापस इस मेट्रो में हमने वो शहर खड़ा कर लिया।

बड़ी अजब बिसात बिछाई है ये प्रभु तुमने मेरे,
ना राजा, ना रानी, ना प्यादा; बस सब हैं मोहरे तेरे।
जब सब ठीक चल रहा होता है हम शहंशाह होते हैं,
अगली बाज़ी में जाने होंगे कहाँ; ता-उम्र इस उलझन में जीते हैं।

1 comments:

Anonymous said...

very true,

jo milta hai wo bhata nahi..
jo bhata hai wo milta nahi..
jo milta aur bhata hai..
wo rahta nahi....


-Garima