Tuesday, February 15, 2011

मेरी आँखों ने बस वही पढ़ा था...



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तुम्हारी आँखे पढ़ी है मैने, बस यही चूक है मेरी.
जब राज़ खुलने लगे, कितनी ख़ामोशी से तुमने नज़र है फेरी.


तुम्हारा मौन सुना है मैने, बस यही ग़लती है मेरी.
मौन तो मौन होता है, परिभाषा बदलते भला कब लगती है देरी.


तुम्हारा संग जिया है मैने, बस यही गुनाह है मेरा.
जब लगा यूँ ही साथ बैठे रहें, उठे और चल दिए तुम करने कोई फेरा.


तुम्हारे होठों पे सजे गीत सुने हैं मैने, और बावला मन है डोला.
हर बोल को तुम्हारी ज़ुबां समझा, लेकिन तुम्हारी ज़ुबां ने वैसा कुछ नहीं बोला.


तुम्हारी कशमकश को भी जाना है; यही मेरी दुविधा है,
सब समझता है ये हताश मन; बेमानी सी हर सुविधा है.


तुम्हे निर्मोही भी तो कह नही सकते, तुम स्वयं नितांत अकेले लगते हो.
उस अकेलेपन में कहीं मैं हूँ क्या? ... ये राज़ भी तो नहीं कहते हो.


ये मन गीली मिट्टी सा था और उस पर पाँव तुम्हारा था.
सूखा निशान आज भी अमिट सा है; एक बार तुम्हे दिखाना था.


ऐसा लगता है जैसे तुमने भी पैरों से वो माटी कभी धोई नहीं.
बखूबी छुपा ले गए तुम और बस ये पहेली कभी खोली नहीं.


सोचा है अक्सर... कभी एक बार, बस एक बार तुमसे पूछना चाहिए क्या?
उस मौन, उस निगाह, उस संग का मतलब भला था क्या?


फिर सोचा है अक्सर... लेकिन अगर तुमने नकार दिया तो?
और इस मन ने और दर्द सहने का हौसला छोड़ दिया तो?


अनकहा था, अनसुना था, नाज़ुक सा वो एक एहसास... जो खामोश जिया था.
मेरी आँखों ने बस वही पढ़ा था, जो कुछ तुम्हारी आँखों ने बयाँ किया था.


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1 comments:

Sunita Singh said...

you have left me completely speechless Mamta !!
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ये मन एक गीली मिट्टी सा था और उस पर पाँव तुम्हारा था,
सूखा निशान आज भी अमिट सा है; एक बार तुम्हे दिखाना था.

ऐसा लगता है जैसे तुमने भी पैरों से वो माटी कभी धोई नहीं,
बखूबी छुपा ले गए तुम और बस ये पहेली कभी खोली नहीं.
dil choo liya.............ya kahoon ki dukha diya !

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