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याद करके तुमको सुख मिलता है,
मिला है प्रभु मेरे.
थका मन चाहे भी तो...
तुम्हारी चौखट पर ही सो जाऊं.
याद करके तुमको भय मिटता है,
मिटा है प्रभु मेरे.
सहमा मन चाहे भी तो...
ठाकुर-द्वारे भीतर बंद हो जाऊं.
याद करके तुमको बुरा वक़्त टलता है,
टला है प्रभु मेरे.
हताश मन चाहे भी तो...
तुम्हे थामे कठिन पल से निकल जाऊं.
याद करके तुमको भवसागर तरता है,
तरा है प्रभु मेरे.
डूबता मन चाहे भी तो...
आज एक बार फिर मैं तर जाऊं.
लेकिन क्यूँ कभी-कभी तुम्हे पुकार न पाऊं?
क्यूँ जैसे बस मूक हो जाऊं?
नयन बंद कर निहार न सकूँ.
अशांत इस मन में तुम्हे बिठाल न सकूँ.
घनघोर उलझन में क्यूँ ध्यान हर लेते हो?
कर देते हो विक्षिप्त क्यूँ?
तज देते हो विवेक-हीन क्यूँ?
क्यूँ बस अपनी नियति को ही प्रथम रखते हो?
शून्य हो जाऊं, मूढ़ हो जाऊं.
पल-पल घबराऊँ, लेकिन...
जब हर लो सदबुद्धि... तो कैसे तर जाऊं?
प्रभु, मैं कैसे तर जाऊं?
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मिला है प्रभु मेरे.
थका मन चाहे भी तो...
तुम्हारी चौखट पर ही सो जाऊं.
याद करके तुमको भय मिटता है,
मिटा है प्रभु मेरे.
सहमा मन चाहे भी तो...
ठाकुर-द्वारे भीतर बंद हो जाऊं.
याद करके तुमको बुरा वक़्त टलता है,
टला है प्रभु मेरे.
हताश मन चाहे भी तो...
तुम्हे थामे कठिन पल से निकल जाऊं.
याद करके तुमको भवसागर तरता है,
तरा है प्रभु मेरे.
डूबता मन चाहे भी तो...
आज एक बार फिर मैं तर जाऊं.
लेकिन क्यूँ कभी-कभी तुम्हे पुकार न पाऊं?
क्यूँ जैसे बस मूक हो जाऊं?
नयन बंद कर निहार न सकूँ.
अशांत इस मन में तुम्हे बिठाल न सकूँ.
घनघोर उलझन में क्यूँ ध्यान हर लेते हो?
कर देते हो विक्षिप्त क्यूँ?
तज देते हो विवेक-हीन क्यूँ?
क्यूँ बस अपनी नियति को ही प्रथम रखते हो?
शून्य हो जाऊं, मूढ़ हो जाऊं.
पल-पल घबराऊँ, लेकिन...
जब हर लो सदबुद्धि... तो कैसे तर जाऊं?
प्रभु, मैं कैसे तर जाऊं?
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