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निगल जाने को दौड़ता अकेलापन,
बार बार कांपता ये सहमा मन,
हर बार तुम्हारे दूर जाने पर,
एक बार फिर टूट जाने पर,
कोशिश करती हूँ खुद को समझाने की,
दूर ही सही पर जुड़े हैं हम ये बताने की.
तुम्हारे मेरे बीच का अटूट ये सन्नाटा ,
मेरे चेहरे की मुस्कराहट, भीतर का ज्वारभाटा,
तुम्हारे यूँ ही मूक हो जाने पर,
पास होकर भी पास न आने पर,
कोशिश करती हूँ खुद को समझाने की,
तुम्हारी अनकही तमाम बातें खुद को सुनाने की.
गुम हो गयी चंचला को खोजती हुई,
रूठ जाती थी जो उस अल्हड़ को ढूँढती हुई,
तुम्हारे इस विरक्त से बर्ताव पर,
सर्वस्व हर कर निराधिकार तज देते इस स्वभाव पर,
कोशिश करती हूँ खुद को समझाने की,
नियति सागर की ओर नदी के खिंचे चले जाने की.
जब मन डूबने सा लगता है,
समय रेत सा हाथ से फिसलने लगता है,
इंतज़ार के लम्बा होते जाने पर,
उम्मीद के फिर से बिखर जाने पर,
कोशिश करती हूँ खुद को समझाने की,
जन्मो का सिलसिला है, इतनी जल्दी क्यूँ है निभाने की.
जन्मो का सिलसिला है, इतनी जल्दी क्यूँ है निभाने की.
कोशिश करती हूँ खुद को समझाने की
कई बार...
कोशिश करती हूँ खुद को समझाने की
हर बार...
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